बाबा बैजनाथ धाम : मंदिर हमारी सांस्कृतिक धरोहर है , कृपया इसके दीवारों को गन्दा न करें !

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मुख्यमंत्री झारखण्ड , झारखण्ड पर्यटन विभाग , देवघर नगर निगम , मंदिर प्रशासक , जिला अधिकारी एवं इस व्यवस्था से सम्बंधित सभी अधिकारी का ध्यान इस ओर आकर्षित करना चाहता हूँ ।

देवघर भारत के झारखंड  राज्य का एक शहर है जो, हिन्दुओं का प्रसिद्ध तीर्थ-स्थल है।बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक पवित्र वैद्यनाथ शिवलिंग झारखंड  के देवघर में ही स्थित  है. इस जगह को लोग बाबा बैजनाथ धाम के नाम से भी जानते हैं ।अभी हाल फ़िलहाल के मेरे अवकाश में मुझे अपने भतीजे के मुंडन हेतु बाबा की नगरी जाने का सौभाग्य मिला । लगभग 4 साल के बाद मेरा भी जाना हुआ था , तो उत्साह अपने जगह कायम था । बचपन से आजतक न जाने कितने ही बार वहां जाना हुआ है । पापा के नए बस खरीद लाने के बाद हमलोग पुरे परिवार के साथ बाबाधाम जाते रहे थे । बचपन की कई यादें जुडी हुई है जो वहां पहुंचकर सहसा ही ताजा हो गयी थी । वहां सभी गांव , जिले कसबे के अपने अपने पांडा जी होते हैं ..अमूमन सभी भक्तों को अपने अपने पांडा जी की खबर रहती है -जो वहां पहुँच कर उनसे मिलने के बाद बाबा को जल चढाने मंदिर जाते हैं । पांडा जी ही पूजा पाठ का सब ख्याल रखते हैं – बचपन से यही देखता आया , कुछ भी अजूबा नहीं लगा , शायद यही सिस्टम था तो सब सही ही लगता रहा । मगर इस बार दर्शन में कई नयी चीजों की तरफ ध्यान आकर्षित हुआ ,जिसे इस पोस्ट के माध्यम से लिखने की कोशिश कर रहा हूँ । एक बार आप भी पढ़िए और अपनी प्रतिक्रिया जरूर दें ।

मैं आस्तिक  व्यक्ति हूँ तो उस तरफ किसी भी तरह की टिका टिपण्णी करने से बचना चाहूंगा…मैं ये नहीं पूछूंगा की जिस शिव गंगा के एक समय स्नान करने के बाद ही लोग बाबा भोलेनाथ को जल चढाने जाते थे , उसका पानी अब इतना हरा हो चूका है की पैर भी अंदर करने में डर लगता है ..हो सकता है की जिला प्रशासक ने उसे उसी रूप में स्वीकार कर लिया हो ..मुझे इसकी तनिक भी ग्राउंड लेवल की जानकरी नहीं है सो कुछ बोलने से कोई फायदा नहीं ( शायद मैं गलत भी हो सकता हूँ अपने विचारो में )

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मैं ये भी नहीं कहूंगा की अब तो बाबा भोलेनाथ के मुख्य मंदिर में टॉल गेट लग गया है ..जी , आपने सही सुना …लेकिन इस टॉल गेट में कोई दरवाजा नहीं ..कोई टिकट नहीं , कोई स्वैपिंग मशीन नहीं ..लेकिन जैसे बिना टॉल गेट पर पैसे दिए आप अंदर नहीं जा सकते ..वैसे ही एक नया अनुभव मिला ..एक थोड़े अच्छे  कद काठी से मजबूत पांडा जी गेट पर खड़े नजर आये ..और हर अंदर जाने वाले श्रद्धालुओं से पैसे कलेक्ट कर रहे थे हालाँकि उनकी आवाज में *स्वेच्छा से बाबा के दरबार में चढ़ाइये* जैसे ही वाक्य थे ।

अंदर गए तो भीड़ और एक दूसरे को दबाकर आगे बढ़ने की आम जनता की ललक आज भी वैसे ही थी ..इतना छोटा सा दरवाजा और अंदर का बाबा का कमरा…भीड़ को एक दूसरे को भेङ की तरह ट्रीट करना कुछ नया नहीं था ..मगर एक चीज नया जरूर था ।                                                                                                                                                        मैं लाइन में लगा हुआ अपनी बारी का इन्तजार कर रहा था , तभी पीछे से एक छोटी सी रेलगाड़ी नुमा कुछ लोगो की लाइन मुझे Cross करके बगल से आगे बढ़ती दिखी । मैंने रोकने की कोशिश भी नहीं की , क्योंकि सबको पता होता है की उनलोगो ने मंदिर के पांडा जी रूपी टिकट कलेक्टर से स्पेशल रिजर्वेशन करवाया होगा तभी आसानी से अंदर जा रहे । भगवान के दर्शन पैसे खर्च करने से काफी आसानी से हो जाते हैं ..पुरे भारत के किसी कोने में चले जाईये , यही होता है – यही सत्य है ।

अंदर का भी यही हाल था , काफी मशक्कत के बाद जल चढाने का मौका मिला..प्रसाद के रूप में बेल पत्र उठाते ही बैठे हुए पांडा जी ने बोला..बाबा को चढ़ावा चढ़ाइये..अब मैं भी ठहरा भक्त ..निकाला 100  का नोट और उनके हाथों में थमा दिया …अपनी इच्छा से दिया कोई दुःख नहीं है..लेकिन निकलते निकलते अपने ही जल पात्र से चढ़ाये हुए फूल माला को उठाने लगा तो एक और पांडा जी ने हाथ रोक दिया – उन्होंने भी कहा की बिना चढ़ावा के कुछ नहीं मिलता यहाँ ..मैंने उतनी ही मासूमियत से कहा ..बाबा , अभी तो मैंने उनको 100 का चढ़ावा दिया ..इतना सुनते ही वो विफर गए और बोलते हैं वो मेरा दुश्मन है ..उसको क्यों दिए…मैं चुप चाप वहां से निकल गया ..दुश्मन , ये बाबा क्या बोल दिए…खैर ..इसकी भी कोई शिकायत नहीं है ..किसी ने कनपटी पर बन्दुक सटा के तो नहीं न कुछ माँगा ।

अब वक़्त था , बहार निकल कर पार्वती जी के मंदिर का दर्शन करने का , आरती का नजारा काफी अद्भुत था , व्यक्तिगत रूप से मुझे बहुत पसंद आया ..बाहर एक LED स्क्रीन भी लगा दिया गया था ..उसमे बाबा के श्रृंगार का एक एक क्षण दिखाया जा रहा था .अंदर के भीड़ भाड़ से ज्यादा अच्छा वो स्क्रीन पर ही दर्शन करना लगा ..मन ही मन स्क्रीन लगवाने वाले की बड़ाई किये बिना नहीं रहा गया ।

अब वक़्त था बाहर शांति से एक जगह खड़े होकर बाबा का ध्यान करने का …आंख खोलकर एवं आंख बंद करने के अथक प्रयास के वावजूद भी ध्यान केंद्रित नहीं कर पा रहा था ..ॐ नमः शिवाय के मंत्रोच्चारण के साथ बहुत देर तक कोशिश करता रहा ।

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मेरे मन के भाव कुछ यूँ थे जो मंदिर और उसके आसपास के बने माहौल को देखकर उमर रहे थे !

क्या ये पंडित जी अपने ड्रेस में नहीं बैठ सकते थे ? ..इनके प्रति मेरे मन में आदर भाव क्यों नहीं आ रहे हैं ? इनको यहाँ जींस पेंट में कौन बैठने बोला ? कही कोई ढोंगी तो नहीं ..इत्यादि !

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क्या ये पंडित जी अपने ड्रेस में नहीं बैठ सकते थे ?

ॐ नमः शिवाय से ज्यादा अलग अलग पांडा जी का नाम और उनका कांटेक्ट नंबर पढ़ने की कोशिश करता रहा ..साथ ही मन में यही भाव , आखिर मंदिर के दीवारों को गन्दा करने का हक़ उन्हें किसने दिया ? क्या किसी गेट के पास एक दीवार पर सभी गांव के पांडा जी का नाम एक बोर्ड पर अंकित नहीं करवा सकते हैं ये लोग ? जो जितने पुराने एवं पावरफुल पांडा जी होंगे , उनका नाम और कांटेक्ट नंबर सबसे आगे होगा और जो नए बने होंगे शायद उनका नाम मंदिर के पीछे वाली दीवार पर लिखा होगा..ये गलत है ..ऐसा करके इनलोगो ने मंदिर की सुंदरता को ख़राब किया हुआ है , इसके जीर्णोद्धार की आवश्यकता है और एक नियम बनना चाहिए की मंदिर की दीवारों को गन्दा करने का हक़ किसी को नहीं ।

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मंदिर के दीवारों को गन्दा करने का हक़ उन्हें किसने दिया ?

मुझे ठीक से ज्ञात नहीं कि मंदिर का कंस्ट्रक्शन कब हुआ , लेकिन इतना जरूर समझ पा रहा था कि आस पास के जितने भी घर हैं वो मंदिर आंगन से काफी सटे हुए हैं , मंदिर का कैंपस उतना विशाल नहीं है ..आने जाने का मुख द्वार ( पराठा वाली गली अदि ) भी बहुत सँकरा है ..सालों से ऐसा ही रहा है और आगे भी कोई इस में खास सुधार कि उम्मीद नहीं है …प्रक्टिकली उचित भी है – सबने पक्का का मकान बना रखा है ..कुछ मकान की ऊंचाई मंदिर से भी ऊपर है …लेकिन वहां भी लोगो ने पैसा कमाने का जरिया खोज निकाला है ..आप जिधऱ भी नजर दौरा लीजिये , आपको रूपा कंपनी का लोगो ही नजर आएगा ..मंदिर का आंगन कम और विज्ञापन का बोर्ड ज्यादा नजर आता है । 

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अभी हाल फ़िलहाल हमने विश्वनाथ काशी नगरी के बारे में पढ़ा , सुना । कुम्भ मेला का सफल आयोजन देखा …अगर प्रशासक चाह ले तो कुछ भी असंभव नहीं है । देवघर के प्रशासक भी सजग प्रतीत होते हैं तभी आज सुबह ये नीचे लिखा हुआ समाचार पढ़ने को मिला । मगर मेरा अनुरोध है की उनके थोड़े और प्रयास एवं सजगता से इस मंदिर की सुंदरता को और निखारा जा सकता है ।

देवघर को मिलेगा राष्ट्रीय स्वच्छता एक्सीलेंस अवार्ड

“बाबाधाम का सौंदर्यीकरण सर्वोच्च प्राथमिकता पर है और कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी (सीएसआर) के तहत अभियान चलाया जा रहा है। पिछले छह महीनों में, यह दूसरी बार है जब देवघर को स्वच्छता सेवा गुणवत्ता के लिए सुर्खियों में रखा गया है। सितंबर 2018 में, बाबाधाम मंदिर को भारत सरकार के पेय और जल स्वच्छता विभाग द्वारा देश के 10 मंदिरों में से 3 स्वच्छ प्रतिष्ठित स्थान घोषित किया गया था।दीनदयाल अन्त्योदय योजना राष्ट्रीय शहरी आजीविका योजना के अंतर्गत ये अवार्ड 15 फ़रवरी को नई दिल्ली में प्रदान किया जायेगा। विज्ञानं भवन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ये अवार्ड प्रदान कर सकते हैं।”

  • मंदिर हमारी सांस्कृतिक धरोहर है , कृपया इसके दीवारों को गन्दा न करें – हो सके तो मंदिर की सभी दीवारों को साफ़ करवाए एवं उचित जीर्णोद्धार कार्यवाही भी करें ।
  • मुख्य द्वार के पास एक बड़ा सा नोटिस बोर्ड बनवा दें और उस पर एक जगह सभी पांडा जी का नाम और नंबर लिखवा दें
  • एक नियम बनाये , ताकि मंदिर के पुजारी भी उस नियम को तोड़ न पाएं
  • मंदिर प्रांगण से दिखने वाले हर घर वाले को बुलाये , उनसे वार्ता करें और उन्हें बताये की मंदिर की सुंदरता उनकी लोभ की वजह से खराब हो रही है ।
  • काशी की तरह ही स्ट्रीट आर्ट कलाकार को उपलब्ध कराये और उनसे हर हो दीवार जो मंदिर प्रांगण से दिखती है या मंदिर की तरफ है – उस पर भोलेनाथ या कुछ उसी आर्ट विधा से दीवारों को सजवा दें , यकीं मानिये ये उतना भी मुश्किल कार्य नहीं है और इसका परिणाम काफी मनमोहक होगा ।

 

इस पोस्ट के माध्यम से किन्ही व्यक्ति या समाज विशेष को आहत करने की तनिक भी नहीं चेष्टा की गयी है , फिर भी यदि इसे पढ़कर किन्ही को धार्मिक तौर पर कुछ बुरा लगे तो उसके लिए अभी ही क्षमा प्रार्थी हूँ ! काशी के फोटो का प्रयोग प्रतीकात्मक रूप से किया गया है ! देवघर के लगाए गए सभी फोटो मेरे कैमरा से ली गयी है ! 

Vikash Ranjan

Tokyo , Japan

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