माँ सरस्वती भारत ही नहीं जापान में भी रहती हैं।

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जन्मदिन की शुभकामनाएं मम्मी 

जबसे होश संभाले , मम्मी का जन्मदिन दीपावली के दिन ही मानते हैं । बचपन में यही बोलकर खुश हो जाते थे की आज पूरा देश आपका जन्मदिन साथ में मना रहा हैं । कभी किसी खास तरीके से अलग से मनाने का मौका नहीं मिला । हमारे देश में आज भी अगर घर में बिटिया का जन्म दीपावली ( लक्ष्मी पूजा ) के दिन होता है तो अमूमन बेटी का नाम लक्ष्मी ही रखा जाता है । मेरी मम्मी के बड़का बाबू (चाचा जी) का नाम ” लक्ष्मी बाबू” था और मेरी नानी के लिए समस्या ये थी की अपने बेटी का नाम भैंसुर के नाम पर रखे तो पुकारेंगे कैसे ? फिर नानी और मम्मी की गौरा वाली मामा ( मौसी के चचेरी सास ) ने इनका नाम ” सरस्वती ” रखा ।

दो बड़े भाई और तीन बड़ी बहन के बाद नाना नानी जी की चौथी बेटी थी तो तब के घर के माहौल का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है । मेरी नानी का कहना था की इसको अच्छे से पालेंगे , कल को इसे एक अलग गाँव , समाज और परिवार बसाना है । नानी के शब्दों को अक्षरसः चरितार्थ करती मेरी माँ सरस्वती हमारे लिए देवी माँ साहस की प्रतिमूर्ति ही हैं । सादर नमन ! जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएं मम्मी ! आपके अच्छे स्वास्थ्य की कामना करता हूँ और आपका आशीर्वाद हम बच्चों पर सदैव बना रहे ।

जापान आये मुझे अब ३ साल होने वाले हैं , मुझे जिस चीज ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया वो हैं हमारे हिन्दू धर्म और जापानी सभ्यता के बीच का आपसी परस्पर सांस्कृतिक सम्बन्ध ।

एक तरफ भारत में जहाँ माँ सरस्वती को साहित्य, संगीत, कला की देवी माना जाता है ,वहीं जापान में सरस्वती को ‘बेंजाइतेन‘ (弁才天, 弁財天) कहते हैं। जापान में उनका चित्रन हाथ में एक संगीत वाद्य लिए हुए किया जाता है। जापान में वे ज्ञान, संगीत तथा ‘प्रवाहित होने वाली’ वस्तुओं की देवी के रूप में पूजित हैं। 6वी7वीं शताब्दी से जापान में बेंजाइटन देवी की पूजा शुरू हुई जो वर्तमान में भी जारी है। बेंजाइटन की पूजा जापानी शिंतो धर्म के लोग करते हैं। शिंतो धर्म को ही ‘कामी’ कहते हैं। उनका मानना है कि देवी बेंजाइटन ने ही इस प्रकृति, जीव और ब्रह्मांड की उत्पत्ति की है।

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जापान में देवी बेंजाइटन की तीन प्रसिद्ध मंदिर मौजूद हैं। जहां देवी बेंजाइटन की पूजा होती है। यहां श्रद्धालु दूर-दूर से दर्शनार्थ के लिए आते हैं। हिरोशिमा प्रांत में ‘इत्सुकुशुमा मंदिर’, कानागावा प्रांत में ‘इनोशिमा मंदिर’ और शिंगा प्रांत में ‘होगोन-जी मंदिर’ देवी बेंजाइटन की प्रमुख मंदिर हैं।

देवी बेंजाइटन या सरस्वती जापान में दो रूपों में पूजी जाती है। एक रूप में उनके आठ हाथ हैं तो पूजी जाने वाली दूसरे रूप में उनके कवल दो हाथें हैं। दो हाथों वाले रूप में वो वीणा जैसी एक जापानी वाद्ययंत्र बिवा धारण किये हुए है।

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सनातन धर्म में पूजे जाने वाले कई देवी-देवताओं जैसे गणेश, इंद्र और लक्ष्मी की पूजा यहाँ वर्षों से की जाती रही है। जापान में उन देवों की भी पूजा की जाती है जिन्हें सनातन धर्म के लोग शायद बिसर चुके हैं।

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Shivling at Toganji Temple in Nagoya
Shivling at Toganji Temple in Nagoya
Naritasan-temple-all-Hindu-God-and-goddess-painted-around
Naritasan Shinshoji Temple (成田山新勝寺) : All Hindu God and goddess painted around

भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अपने हाल फ़िलहाल के जापान यात्रा के दौरान भारतीय समुदाय को सम्बोधित करते हुए भी इस बात का जिक्र किया था – उनके शब्दों में :

भारत और जापान के बीच संबंधों की जड़ें पंथ से लेकर प्रवृति तक हैं। हिंदू हो या बौद्ध मत, हमारी विरासत साझा है। हमारे आराध्य से लेकर अक्षर तक में इस विरासत की झलक हम प्रति पल अनुभव करते है। मां सरस्वती, मां लक्ष्मी, भगवान शिव और गणेश सबके साम्य जापानी समाज में मौजूद हैं। सेवा शब्द का अर्थ जापानी और हिंदी में एक ही है। होम यहां पर गोमा बन गया और तोरण जापानी में तोरी बन गया। पवित्र Mount Ontake (ओंताके) पर जाने वाले जापानी तीर्थयात्री जो पारंपरिक श्वेत पोशाक पहने हैं, उस पर संस्कृत-सिद्धम् लिपि के कुछ प्राचीन वर्ण भी लिखवाते हैं। वे जब श्वेत जापानी तेंगुई पहनते हैं तो उस पर ऊँ (ओम्) लिखा होता है।

भारत और जापान के रिश्तों के ताने बाने में ऐसे अतीत के बहुत से मजबूत धागे हैं। भारत और जापान के इतिहास को जहां बुद्ध और बोस जोड़ते हैं, वहीं वर्तमान को आप जैसे नए भारत के राष्ट्रदूत मजबूत कर रहे हैं। सरकार का राजदूत एक हैं लेकिन राष्ट्रदूत यहाँ हज़ारों हैं। आप वो पुल हैं जो भारत और जापान को, दोनों देशों के लोगों को, संस्कृति और आकांक्षाओं को जोड़ते हैं। मुझे खुशी है कि आप अपने इस दायित्व को सफलता के साथ निभा रहे हैं।

साथियों, मेरी जब भी प्रधानमंत्री श्री आबे से बात होती है तो वो भारतीय समुदाय की इतनी तारीफ करते हैं कि मन गदगद हो जाता है। आप लोगों ने अपने कौशल से, अपने सांस्कृतिक मूल्यों से यहां बहुत सम्मान अर्जित किया है। योग को आप जापान के जनजीवन का हिस्सा बनाने में सफल रहे हैं। यहां के मेन्यू में आपने कढ़ी चावल ला दिया और अब तो आप दीवाली भी अपने जापानी दोस्तों के साथ मनाते हैं। आपने मार्शल आर्ट्स में निपुण इस देश को कबड्डी की कला भी देना शुरू कर दिया है और अब आप क्रिकेट के कल्चर को भी विकसित करने में जुटे हैं। आपने जिस तरह Contribute, Co-exist to Conquer (कोंकर) Hearts के मंत्र से जापानी दिलों में जगह बनाई है वो सचमुच काबिलेदाद है।  मुझे प्रसन्नता है कि 30 हज़ार से अधिक का भारतीय समुदाय यहां हमारी संस्कृति के प्रतिनिधि के रूप में काम कर रहा है।

विकास रंजन 

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